Wednesday, 10 April 2019

ख़्याली पुलाव।

कौन कहता है यारी में इश्क़ का ख़्याली पुलाव नही पक सकता,
वो शाम को काम ख़त्म करने के बाद की बेचैनी,
कि बस एक दफ़े तुमसे बात हो जाये,
जैसी ख़्वाईशे करने में मज़ा आता है अब रोज़।

तुम्हारी तस्वीरों को भी,
सागवान के एक बक्से में बंद करके,
उन्हें अपने पास संभालकर रख रखा है मैने,
कुछ उन चुनिंदा चीज़ों में जो हर पंद्रह दिनों में,
एक बार,उस संदूक से ज़रूर निकलती है,
ताकि धूल की उस बेशर्म महीन परत को निकाला जा सके,
जो इतनी ज़िल्लत सहकर भी वापस आ जाती है।

ऐसे ही कुछ दिन पहले,
अपनी एक पुरानी फ़ाइल ढूंढते हुए
तुम्हारा एक ख़त मिला,
जिसपे तुम्हारी नास्तलिक लिखी हुई थी,
और तुम्हारे अनगिनत लफ़्ज़,
जो मेरे लिए एक ख़ज़ाने से कम नही थे,
मैने वो ख़त पढ़ना चालू किया,
शायद सो वी बार पढ़ रहा था मैं,
तेज़ी से आख़िरी लफ्ज़ तक पहुँचा,
और फिर बाइज़्ज़त उसकी घड़ी के हिसाब से,
उसे तह करके हिफाज़त से अंदर रख दिया,
वो याद सिमटते हुए वापस खड़ी हो गयी।

फ़िर कुछ ख़्याल आये,
जो अब तक किसी बंद दबी कोठरी में,
एकदम बेसुध पड़े थे
कि बस ढूंढते-ढूंढते उन्हें महीनों निकल गए,
कम्बख़्त एक ख़्याल भी नही आया,
पर आज वो दौड़त-दौड़ते मेरे पास आये,
तेज़ी से हाफ़ते-हाफ़ते,
वो ख़्याल जो आज इन लफ्ज़ो की शक़्ल में,
तुम्हारे सामने नज़र किये हुए है,
मुद्दे की बात ये हैं,
कि मेरे शहर से इतना दूर होकर भी,
तुम उन ख्यालों में मुस्तक़ील हो,
जहां से मैने ये ख़्याली पुलाव तैयार किया है,
चखकर बताओ,
कैसा है?

Thursday, 27 December 2018

ज़रूरत।

ये रातें यूँ ही नही कटने वाली,
इन्हें किसी की सख़्त ज़रूरत है,
कितनी बातें करूं इस एक चाँद और लाख तारों से,
अब तो वो भी मेरी बातों को सुनकर,
बस जम्हाई लेना जानते है
और एक तरफ़ तुम हो,
जिसे मेरे आखिरी अफ़साने में कुछ अलग महसूस हुआ,
मुझे लगता है,
वो शायद वक़्त का तकाज़ा ही होगा,
जिसने उसे अलग बना दिया,
बाक़ी मैंने तो पूरी साफ नियत,
और पूरे होशोहवास में लिखा था,
बस यार तुम उस आखिरी अफ़साने को लेकर परेशां मत होना,
तुम्हें मुतज़सीस करना मेरा मक़सद कतई नही,
मैं तो बस लिखता हूँ,
जो जी मे आता है वो लिखता हूँ,
इन अंदरूनी अफ़सानों की शक़्ल में,
जिसमे ‘तुम’ कोई रहता है और ‘मैं ’कोई,
कहानी आगे बढ़ती जाती है,
और ये रातें यूँ ही कटती जाती है,
क्योंकि इन रातों को,
इन लफ़्ज़ों की सख़्त ज़रूरत है।

Tuesday, 13 November 2018

तुम मुझे ले जाना अपने घर।

तुम मुझे ले जाना अपने घर,
ताकि तुम्हारे घर के कोनो में रखीं
एक-एक चीज़ को मैं बा-इज़्ज़त याद कर सकूँ,
ताकि तुम्हें हमारा घर 'अपने' घर के मुक़ाबले
ज़रा भी पराया ना लगे,
ताकि तुम्हारे मन में वो नई जगह जाने के बाद आने वाली कसक महसूस ना हो,
जिससे अक़्सर परेशां रहते है कुछ लोग,
सवाल रहा वालिद-वालिदा का,
तो उनके जैसे हमशक्ल तो नही ला सकता मैं,
मग़र थोड़ा बहुत सीख सकता हूँ,
तुम्हें संभालना,
चंद दिनों में,
बस तुम मुझे ले जाना अपने घर,
जिससे मैं उस घर के कोनों में रखीं हरेक चीज़ को बा-इज़्ज़त याद कर सकूँ।

Thursday, 1 November 2018

सब कुछ है,बस तुम नही।

इस चाँद की चांदनी में,
ढूंढ रहा हूँ तुम्हें,
तारों से पूछ रहा हूँ तुम्हारा पता,
तुम्हारी गली,शहर,इलाका,
सब धीरे-धीरे जान रहा हूँ,
पर ये तारे खुले तौर पर कुछ कहने से कतरा रहे है,
क्या तुमने उन्हें डराकर,
धमकाकर,चुप करवा दिया है!
मैं भी नही चाहता तुम्हें ढूंढना,
पर उस बेचैनी का क्या,
जो दिल के दरवाज़े पर दस्तक देती है,
रोज़,दबे पाँव,धीरे से,
और फिर तुम्हारे बारे में पूछती है,
खड़ा रहता हूँ आँखे नीची करके,
क्योंकि जवाब नही होता,
कैसे समझाऊं उसे तुम्हारी ज़िद,
वो तो बस मासूमियत से,
तुम्हारी खोज में निकल जाती है,
बस!अब तुम आ जाओ,
अब और ये आंखमिचोली का खेल मुझसे तो नही खेला जाता,
पूछता हूँ चाँद से,शायद कही कुछ सुराग़ बता दे,
इस चाँद की चांदनी में,
जहां तारे है,चांद है,पहाड़ है,आसमां है,सब कुछ है,
बस तुम नही।

Tuesday, 23 October 2018

छत।

मैं आज भी जब अपने नज़र की,
उस तिलिस्मी खिड़की से झाँककर देखता हूँ,
तो मुझेे चार दीवारें, एक आँगन,
और एक छत दिखाई देती है।
जिसमे से आँगन को निकाल भी दूँ
तो कोई बड़ी बात नहीं होगी,
लेकिन कुछ ऐसा है इन तीनों में,
जो आज आप शायद ही महसूस कर रहे हो,
मुंडेरे होती है चारों तरफ़ जिसके,
ताकि घर का छोटा बच्चा खेलते-खेलते
लड़खड़ाकर गिर ना जाए,
सुबह बाबा अपना प्राणायाम करने आते थे जहाँ,
भोर की उस चिलचिलाती सर्दी में,
जब रिश्ते हमारे लोगों से ज़्यादा,
रज़ाइयों से बना करते थे,
फ़िर माँ किसी रविवार आती थी,
मुझे लेकर,छत पर,हाथ बटाने,
और मैं आखिर तक,
मुँह फुलाये बैठा रहता था,
देखते हुए,उन सूख रहे साबूदाने के पापड़ों को।
मेरा बचपन भी छत की उन मुंडेरों पर बैठकर,
ढलते सूरज को देखते हुए निकला है,
जहाँ चिंटू-मिंटू रोज़ एक नए खेल को,
इज़ाद करके,उसको अंजाम तक पहुँचाया करते थे,
जहाँ चिंटू की बड़ी बहन पिंकी,
चुपके-चुपके किसी से छत के एक कोने में,
अपना छोटा-सा डब्बा लेकर,
बतियाया करती थी।
पर फिर मैं,और चिंटू-मिंटू सब बड़े हो गए
और अपने घोसलों से निकलकर,
तालीम लेने के लिए,
बाहर आ गए,जहां वक़्त का बहाव,
रक्त की लय जितना होता है,
बहुत तेज़।
अब उस ढलते सूरज को देखने का भी कोई फायदा नही,
क्योंकि अब वो मुंडेरे नही है,
और ना ही वो छत,
जहां बाबा भोर में प्राणायाम करने आते थे,
अब तो यहां साबूदाने के पापड़ भी दुकानों पे मिल जाते है,
चिंटू की बड़ी बहन को भी अब छुपकर बाते नही करनी पड़ती,
कुछ खास नही बदला इतने वक़्त में,इन शहरों में,
बस अब छते सिमटकर रह गई है कुछ पुराने शहरों में,
कुछ देर बाद,
ये वक़्त भी सिमटकर रह जायेगा,
ख़ुदाहफ़ीज़।



Tuesday, 18 September 2018

आपकी लाड़ली।

जब मैं घर से निकली थी,
तो ज़ेहन में कई सवाल थे,
चिंताएं थी,माथे पर लकीरें भी थी,
और हो भी क्यों ना,
शहर बदलने के लिए,
दिल और दिमाग दोनो की रज़ामंदी तो चाहिए न,
और फ़िर मैं ठहरी घर की सबसे नटखट क़िरदार,
जिसकी एक ख़्वाईश पर,पूरे घर को,
मीना बाज़ार की तरह सज़ा दिया जाता था,
पर अब कुछ तो तब्दीलियत-सी आ गयी है,
क्योंकि ये घर की नटखट किरदार अब घर से थोड़ी दूर है।
घर पर जब तक दो-चार बार बात न हो जाये,
तब तक उन्हें लगता ही नही कि मैं ठीक हूँ,
मेरी खाने की चिंता,मुझसे ज़्यादा तो उन्हें रहती है,
बाबा का रोज़ एक कॉल आफिस से आता है,
जैसे रोज़ उनके लिए मैं एक सुकून की हाज़री हूँ,
वो बहुत फ़िक़्र करते है मेरी,
माँ ने तो अब वीडियो कॉल करना भी छोड़ दिया है,
ताकि मुझे देखकर उनके आंखों में आंसू न झलक पड़े,
पर वो ही जिनको हमेशा फुर्सत रहती है मेरे लिए,
तभी तो वो मेरा हालचाल पूछने में कोई कसर नही छोड़ती,
सुबह के नाश्ते से लेकर रात के खाने तक,
मुझे कुछ याद रहता हो या नही,
लेकिन उन्हें सब याद रहता है,
पर मैं भी आपसे कुछ कहना चाहती हूँ माँ-बाबा,
कि अब आपकी ये गुड़िया,
बड़ी और ज़िम्मेदार दोनो हो गयी है,
मुझे मालूम है वैसे
कि आपके रोज़ दो-चार कॉल आएंगे ही आएंगे,
और इससे मुझे कोई तकलीफ़ भी नहीं,
आपकी आवाज़ सुन लेती हूँ,
तो लगता है जैसे दिन की सारी थकान
एक पल में दूर हो गयी हो,
बस आप हमेशा खुश रहिये,
मैं भी यहाँ काफ़ी खुश हूँ,
पढ़ लेती हूँ,थोड़ा घूम लेती हूँ,
एक किताबखाना है,
जहाँ किताबें मेरी दोस्त है,
उनसे बात कर लेती हूँ तो ख़ालीपन भी नही लगता,
बस अब रात हो गयी है,
कल सुबह आपके कॉल का फिर इंतज़ार करूँगी,
शब्बाख़ैर।

Saturday, 25 August 2018

करवटें बदलती गयी रात भर।

करवटें बदलती गयी रात भर,
बस नींद का नामोनिशां नही है,
कुछ तस्वीरें है धुंधली,
तो कहीं ख़्वाब है उलझे।

पुराने अख़बारों जैसे पुराने ख़्वाब,
जिनसे रद्दी की महक़ भी,
केवड़े-सी लगती है,
बस आ पड़ते है वो बेवक़्त,
जब सारा ज़माना नींद में रहता है,
और हम उन्हीं ख़्वाबों की 
किसी सकड़ी गली में आँखमिचौली खेला करते है।

एकदम बेसुध होकर,
कि ये भी पता नही चलता,
कब तुम्हें ढूंढ़ते-ढूंढते सवेरा हो गया,
और ख़्वाब ने धीरे से अलविदा करते हुए कहाँ,
“फिर आऊँगा रात के दूसरे पहर में"
ताकि करवटें बदलता रहूं मैं,
और नींद का नामोनिशां भी ना रहे।