Thursday, 4 July 2019

आलिंगन।

इस मुखोटे वाली ज़िन्दग़ी से थक-सा गया हूं,
जैसे कि अब बस तुम्हारे आलिंगन का ही सहारा हो,
भूल-सा गया हूँ तुम्हारा स्पर्श,
जिस स्पर्श मात्र से मैं कपकपा जाता था ,
याद है वो पहली दफ़े,
जब तुमने मेरे हाथ पकड़कर,
अपने सीने पर रखा था,
बड़ी शिद्दत से,
एक दूसरे के हवाले हो गए थे हम,
या ख़ुदा,
वो वक़्त आज भी हवाओं में घूमता है,
बचपन की उस कश्ती में सवार थे हम दोनों,
जहाँ ग़लत और सही का कोई पैमाना नही होता,
लेकिन अदब था,जिसने हमे महफ़ूज़ करके रखा।

मैं हमेशा से काफ़ी ख़ामोश तबीयत रहा हूँ,
अजीब-सा डर महसूस होता था मुझे उन चार लोगों के बीच,
लेकिन फिर जब-जब तुम मेरे करीब रही,
मानों सब चिंताएं, सब फ़िक़रे,
जैसे औझल-सी हो गयी हो,
उस आलिंगन में तुम्हारी एक ख़ास महक़ आती थी मुझे,
जो सिर्फ़ तुम्हारी थी,
जो सिर्फ़ तुम्हे बयाँ करती थी,
बहुत याद आती ही है वो महक़ आज भी,
जैसे दिल के किसी दबे कोने में सुलग रही हो,
पर अब उस आलिंगन को याद करने का कोई फ़ायदा नही,
क्योंकि ना तो अब वो बचपन की कश्तियाँ है,
और ना ही तुम,
बस कुछ है तो वो महक़,
जो हमेशा आबाद है,
खुदाहफ़ीज़।

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