Tuesday, 30 March 2021

नीलाम।

वो मिट्टी के जालीदार झरोखों से आती धूप,
हमेशा ही बहुत ज़ायकेदार होती है,
चेहरे पर पड़ते ही ज़माना पीछे चला जाता है,
और हम किसी याद में मसरूफ़  होकर,
वक़्त से आगे निकल जाते हैं।
वो तजूर्बा एकदम उस पहली लिखी गयी कविता जैसा होता है,
जो अभी बस अंगड़ाई लेकर बिस्तर से खड़ी ही हुई है,
और अपने पहले कदम रखकर,
इस जहां की ज़ोरो-आजमाइश में,
ख़ुदको नीलाम कर बैठी है,
हाँ! ये वही कविता है,
जो अब पढ़ी नही जाती,
खुदाहफीज़।


Tuesday, 12 January 2021

तुम ही हो।

तुम ही हो जो हो,
ना भाग्य है ना ईश्वर,
भाग्य है भी तो तुम ही हो सकते हो,
और हो सकते हो तुम ही ईश्वर,
तुम नश्वर भी हो,
और उस नश्वर से ईश्वर तक का मार्ग भी हो,
तुम असामयिक और सामयिक दोनो हो,
उस विवेकज्ञान के मार्गी भी हो,
दुक्ख और सुक्ख के भोगी भी तुम ही हो,
निरोधी भी तुम हो, प्रार्थी भी तुम हो,
तुम ही अनंत हो,
तुम ही आनंद हो।

Thursday, 23 April 2020

मुल्कबंदी।

ये वो मुल्क नही,
जहां के हर एक चौराहे पर,
चकल्लसो का बाजार लगता था,
चाय की टपरियों पर,
सियासत के रंग बिखरे रहते थे
ग़ालिब ओर उनके चाहने वाले,
घरो में कैद क्या हुए,
कि पूरी दिल्ली ही सुनसान हो गई,
लोग पहले बम्बई जाया करते थे,
अब वापस आना चाहते है,
उधर बनारस में लोगो को,
बनारसी पान नही मिल रहा,
कश्मीर से मद्रास की तो छोड़ ही दीजिये,
आप अपने मोहल्ले के,
आगे वाले तिराये तक भी नही जा सकते,
और चले गए,
तो क्या पता,
मौत भी कमबख़्त चाइनीज माल हो गई है,
कब यमराज दूत भेज दें,
इससे अच्छा,
भारत बंद ही रहने दें,
ख़ुदा-हाफ़िज़।




Monday, 13 April 2020

दीवार।

मैं आज कुछ ऐसा कबूल करने वाला हूँ,
जिसे शायद आप शायद थोड़ा अजीब कहे,
दरसल मैं दीवारों से बाते करता हूँ,
और वो मुझे बा-इज़्ज़त जवाब देती है,
और ये सिलसिला बस यूँही चलता रहता है,
देर रात तक गुफ़्तगू होती है हमारी,
उसे कुछ भी बताओ, 
बड़ी तसल्ली के साथ सुनती है वो।

वैसे बाकी लोगों के लिये,
एक दीवार के कई मायने निकाले जा सकते है,
दरसल हर एक इंसान के भीतर एक दीवार है,
जिसके पार वो कभी देखने की जुर्रत नही करता,
उसके जज़्बात उसके लिए सुबूत का काम करते है,
और शायद इसी लिए,
वो देखे हुए को सच और,
सुने हुए को झूठ समझ बैठता है।

क्या आपको नही लगता,
कि दीवारें हमे महफ़ूज़ रखती है,
किसी बाहरी खतरे से नही,
पर हमारे ही भीतर छुपे हुए डर से,
इसलिए भी शायद आदिकाल के इंसानो को, 
गुफाओं में रहने की ज़रूरत महसूस हुई।

यही खेल है दीवार का,
अगर वो सुकून से आपको सुनती है,
तो कही आपकी सोच में रुकावट भी बनती है,
तो कही आपको महफूज़ भी रखती है,
आपके क्या मायने है
एक दीवार के?
ख़ुदाहफीज़।
 



 

Tuesday, 19 November 2019

काश कोई तरीका होता।

काश कोई तरीका होता,
कि अपनी यादों को मिटाया जा सकता,
किसी बंद शीशे की बोतल में क़ैद करके,
संमदर की लहरों के साथ बहाया जा सकता,
काश कोई तरीका होता।

काश कोई तरीका होता,
जिससे हम अपनी यादों को भूला सकते,
कितनी आसान होती ज़िन्दगी,
कि उलझे मसले भी रेशम जैसे सुलझे होते,
फिर तो हम भी साफ़ और सरल होते
एकदम उस काली स्लेट की भाँति,
जिसपे अल्फ़ाज़ लिखे जाते है,
शायद फ़िर इस दुनिया में न तो कोई जंग होती,
और ना ही कोई किसी के मुख़ालिफत होता,
काश कोई तरीका होता।

काश कोई तरीका होता,
कि सब बेफ़िक्र सो पाते,
वरना तो,
ये ज़ख़्म रात में जिंदा हो उठते है,
हाँफते-हाँफते नींद से उठाकर
सहमा देते है,
और ये यूँही रात दर रात चलता है,
अब तो आँखों के नीचे के काले घेरे भी,
साफ दिखने लगे है,
और मेरी ही नहीं आपकी भी कहानी है ये,
आदमज़ात की सबसे बड़ी ना-कामी है ये,
कि हम चाहते हुए भी कुछ नही भूल सकते,
बस, जी सकते है ,उन ज़ख्मों के साथ,
जो होकर भी अंजान है,
और ना-होकर भी मौजूद,
काश कोई तरीका होता।

Monday, 11 November 2019

ये ज़माना क्या कहता है।

ये ज़माना क्या कहता है,
क्या ये ज़माना तुम्हें तुम्हारे वजूद को भूलने के लिए कहता है,
जिसकी बिना पर आज तुम इन लफ़्ज़ों को एक शक़्ल दे रही हो,
जिसकी सूरत पर तो किसी को कोई शक़ नही,
मग़र सीरत पर इस ज़माने को बहोत शक़ है।

ये ज़माना क्या कहता है,
क्या ये ज़माना तुम्हें तुम्हारे कपड़ो को लेकर कुछ कहता है,
जिसकी फ़िक़्र तो कभी उस दर्ज़ी ने भी नही की,
जिसके सुई और धागे के जादू से,
कई रेशमी कपडे बनकर तैयार हुए,
मग़र इस ज़माने को तुम्हारे वाल्दैन से ज़्यादा
तुम्हारे कपड़ो की फिक्र 

ये ज़माना क्या कहता है,
क्या ये ज़माना तुम्हें अपने महीने के आख़िरी दिनों में,
उस अचार की बरनी को ना छूने के लिए कहता है,
जिस बात का अर्थ वो भी आजतक तुम्हें नही बता पाए,
जिसकी तफ़सील तो विज्ञान भी अपने दावो में कर चुका है,
मग़र तुम्हारी पाकीज़गी पर इस ज़माने को बहोत शक़ है।

ये ज़माना क्या कहता है,
क्या ये ज़माना तुम्हें घर पर रहकर काम करने के लिए कहता है,
जिनकी इच्छा के विपरीत तुम बाहर जाकर दो पैसे कमाना चाहती हो,
जिससे तुम्हें अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए,
किसी के सामने हाथ ना फैलाने पड़े,
मग़र,इस ज़माने को तुम्हारे बाहर जाने पर बहोत शक़ है।

असल मे ये ज़माना बहोत शक़ करता है,
कभी तुम्हारी सीरत पर,
कभी कपड़ो पर,
कभी तुम्हारी पाकीज़गी पर,
तो कभी तुम्हारे बाहर जाने पर,
मग़र तुम भी इस ज़माने को बता दो,
कि ज़माने आते जाते रहेंगे,
मैं चट्टान सी खड़ी हूं,
चाहे ज़माना रहे या ना रहे,
खुदाहफीज़।
                             

Thursday, 4 July 2019

आलिंगन।

इस मुखोटे वाली ज़िन्दग़ी से थक-सा गया हूं,
जैसे कि अब बस तुम्हारे आलिंगन का ही सहारा हो,
भूल-सा गया हूँ तुम्हारा स्पर्श,
जिस स्पर्श मात्र से मैं कपकपा जाता था ,
याद है वो पहली दफ़े,
जब तुमने मेरे हाथ पकड़कर,
अपने सीने पर रखा था,
बड़ी शिद्दत से,
एक दूसरे के हवाले हो गए थे हम,
या ख़ुदा,
वो वक़्त आज भी हवाओं में घूमता है,
बचपन की उस कश्ती में सवार थे हम दोनों,
जहाँ ग़लत और सही का कोई पैमाना नही होता,
लेकिन अदब था,जिसने हमे महफ़ूज़ करके रखा।

मैं हमेशा से काफ़ी ख़ामोश तबीयत रहा हूँ,
अजीब-सा डर महसूस होता था मुझे उन चार लोगों के बीच,
लेकिन फिर जब-जब तुम मेरे करीब रही,
मानों सब चिंताएं, सब फ़िक़रे,
जैसे औझल-सी हो गयी हो,
उस आलिंगन में तुम्हारी एक ख़ास महक़ आती थी मुझे,
जो सिर्फ़ तुम्हारी थी,
जो सिर्फ़ तुम्हे बयाँ करती थी,
बहुत याद आती ही है वो महक़ आज भी,
जैसे दिल के किसी दबे कोने में सुलग रही हो,
पर अब उस आलिंगन को याद करने का कोई फ़ायदा नही,
क्योंकि ना तो अब वो बचपन की कश्तियाँ है,
और ना ही तुम,
बस कुछ है तो वो महक़,
जो हमेशा आबाद है,
खुदाहफ़ीज़।