Saturday, 22 April 2017

समझ

जो समझना नही चाहता ,
उसे समझा नही सकते,
खुदकी रगों में टुकड़े बचे है उसके,
पर जिसे नही समझना,
उसे समझा नही सकते,
हेकड़ी की बात है,
या जबर्दस्ती अपनी,
बस नही समझना,
यही ज़िद है और यही लकीर,
फिर चाहे आसमां एक हो,
या फिर ख़ुदा समझाने को आये,
पर जिसे नही समझना,
उसे समझा नही सकते।

Monday, 10 April 2017

बुढ़ापा।

दिन और रात एक सी हो चली,
आँखे खोलकर बिस्तर पर पड़ी रहती है वो,
बूढ़ी,थकी हुई,आलसी पर काम करने को इच्छुक
चलने में बचपना आ गया हैं वापस,
इसलिए लोग भी अब ज़्यादा ध्यान देने लगे हैं,
कितने गुमसुम और फ़ीके हो गए ये दिन,
बगल में अपने अंत की घड़ी में,
रोज़ धीमी-धीमी रेत को रिसते देखकर,
अपना और घड़ी का रिश्ता बरक़रार रखती है,
नानी,दादी कहते हैं जिनको,
ढल रही है उमर,
शायद एक दिन साँझ भी ढल जाये।




Friday, 31 March 2017

बचपन।

पता नहीं कहाँ गए वो दिन,
जिन्होंने शुरूआत में बहुत हँसाया था,
जब ऊंगलियाँ बालपन में थी अपने,
मन बेपरवाह रहता था,पर अब
माथे पे लकीरो से,माथे पर,
रेशम का रास्ता बन चुका है,
तू ही जानता है ,कहाँ गए वो दिन।
झबलो से शुरुआत की थी मैने अपने दिनों की,
आज सूट पहनकर उसी दिन को धीरे से अलविदा करता हूँ,
कुछ तो अलग रहता है वो वक़्त,
जिसे हम बचपन कहकर पुकारते है,
तू ही जानता है,कहाँ गए वो दिन,
धीमे, हल्के, और कच्चे,
बचपन के वो दिन।

Tuesday, 21 March 2017

कब होगा ये सवेरा।

कितना इंतज़ार होगा अब और,
सब्र की भी एक देहलीज़ होती है,
सूरज निकलने को नही मानता,
चाँद लज्जा से मर गया,
पर जाने को तैयार नही,
कब होगा ये सवेरा।
घरों पर ताले बंद पड़े है,
गलियां सुनी-सुनी हो चली,
गाँव ऐसे उजड़े जैसे बस्ती में आग हो,
परिवार उस बैलगाड़ी में बैठा हुआ,
अपना पुश्तेनी मकान देख रहा है,
झरझर,पुराना,लेकिन यादों का ज़खीरा,
पर कोई नही जानता
कब होगा ये सवेरा।

Tuesday, 14 March 2017

रुआँसा।

मन अट नही रहा,
चारो तरफ लोगो का ज़खीरा,
फिर भी लगता है जैसे,
किसी शमशान में अकेले घूम रहा हूँ,
वैसे कल होली की मुबारकबाद,
दे ही दी उन्होंने,
लगा की अब इससे ज़्यादा ख़ुशी की बात क्या है,
पर आज फिर सब रुआँसा हो गया,
फ़र्क़ है आज और कल में,
और मन भी तो अपना मालिक है,
ना मेरी चलने देता है,
ना दिमाग की सुनता है,
बस भटकता है इधर-उधर,
किसी की तलाश में।

Wednesday, 8 March 2017

सुकूँ।

आज लिखकर भी सही नही लग रहा,
कुछ अधूरा है शायद,
कलम भी है मेरे पास ,
कागज़ भी है,
पर सुकूँ नहीं,तभी कही,
कुछ अधूरा है शायद।
ये सुबह से लेकर शाम तक भागते लोग मेरी क्या मदद करेंगे,
इन्ही के पास सुकूँ नही तो जाऊ कहाँ?
या अल्लाह बक्श दे न कुछ आराम,
सुकूँ से ही रह लूँगा कुछ दिन,
जहाँ मेरे लोग होंगे,मेरी सल्तनत होगी,
और मैं उस सल्तनत का बादशाह रहूँगा।

Tuesday, 28 February 2017

खफा।

खफा-खफा से है वो हमसे,
अब तो कुछ बात ही नही करते
वक़्त हो गया एक जवाब देने का,
लेकिन दूर कही वो सन्नाटे में है।
और हम,अपनी फ़र्ज़ अदायी में,
फ़र्ज़ है निग़ाह नही मिलनी चाहिए,
नही तो नापाक करार दिए जायेंगे,
लेकिन कभी कोई इरादा भी नही था,
कि इस अदब के बाहर जाए,
पर इश्क़ ख़ता नही,
और मैं उस ख़ता का मुजरिम नही,
हमने तो सफ़र अकेले शुरू किया,
और अकेले ख़त्म कर देंगे,
पर चुभने की बात ये है कि,
खफा-खफा से है वो हमसे,
अब तो कुछ बात ही नही करते।
                                           -साँझ।