Thursday, 12 January 2017

एक मुस्कान।

कभी इस ज़मी पर उतरा था मैं,
अंजाना,उन सारी चीज़ों का,
जिनका अंदाजा नही लगाते हम,
लेकिन महसूस करने पर उन लोगो का दर्द,
और वो गुज़र-बसर करने की फिक्र
साफ़ तौर पर दिखाई देती है।

उन नन्ही सी जानो में,
जो आगे चलकर हमारे इस वतन में ,
एक ख़ास किरदार निभा सकते है,
पर इस किरदार की मुस्कान तो कही नही दिखती,
क्योंकि इन्हें वो मुस्कान भी नही मिल रही,
जिसके सब हम शुरुआत से हक़दार थे।

इसलिए वो मुस्कान जो किरदार की है,
हमे उन मासूमो के मुर्झाए हुए चेहरे पर देखनी है,
ताकि उनको लगे की वो जितने ख़ास है,उतना कोई नही,
ताकि उनको जो पीड़ा हुई वो किसी और को ना हो,
बस अब इस आस्मां में वो टूटे हुए तारे देखने है,
जिससे उस मुस्कान को क़ैद कर के,
उन बच्चो के हाथ में थामकर ,
कुछ तसल्लीे भरे चेहरों से ही,
हम अपनी ज़िन्दगी का मकसद कायम कर ले।

Sunday, 11 December 2016

इंतज़ार।

मैं कभी सोचता हूं कि काश इन सारी जद्दोजहद से कुछ वक़्त के लिए तो आराम मिलता। ज़िन्दगी में तकलीफे आती है तो कभी ऐसा मुकाम भी आता है जब सुकून नसीब हो जाता है, पर कुछ बंधा हुआ नही है ,आज कुछ है तो कल कुछ और। इसलिए जब महसूस करता हूं की शायद आज मैं कुछ अच्छा हूं, जैसे इन सांसारिक मोह मायाओ की कोई जगह ही नही मेरी किताब में, पर कभी ऐसा लगता है कि घुट-घुट कर ही किसी बंद कमरे में हमेशा के लिए क़ैद होकर रह जाऊंगा।
तब ज़रुरत लगती है कि काश कोई हो जिसके कंधे पर सर रखकर हम उसमे खोकर दुनिया की सारी चीज़ें भूल जाए। वो कुछ तसल्ली दे ,में थोड़ा आराम करू। में एकदम डरा हुआ किसी हिरण की तरह उसके सीने से जाकर लग जाऊ। माँ तो नहीं है वो पर कोई ऐसा ज़रूर, जिससे बहुत लगाव है और उसके करीब रहने का एक नशा।
ऐसा नही कह सकते की ये चीज़ गलत है, पर ऐसा ज़रूर कह सकते है कि हर किसी की ज़रूरत कही ना कही, कभी ना कभी तो ये रहती ही होगी। क्योंकि ज़रूरत है ,कोई अंदर की बात जिसे किसी से भी साझा नही किया जा सकता वो हम एक सच्चाई के साथ किसी सबसे ज्यादा सच्चे इंसान को बताये। और मुझे इंतज़ार है उस सांझ का,जिसके ढलने के बाद, एक सवेरा, और एक उम्मीद की किरण ज़रूर निकलेगी।

Monday, 26 September 2016

गाथा।

आधी रात का वक़्त है ,
ना कोई सो रहा है,
ना सोने दे रहा है,
तारो वाला ज़माना गया अब,
जब सुकून से हमको सुलाते थे,
अब सिर्फ आतंकी जगाने वाले है,
जो माथे पर बैठकर कभी,
हिन्द-पाक की सरहदों पर अड़े है,
ना सोयेंगे ना सोने देंगे।
जम्हूरियत् के नीचे खड़े है,
सल्तनत् के लिए लड़े है,
यही सैनिक् का पेशा है,
एक फ़ोन अभी भी जाता है,
सबको बता पाता है,
माँ, पत्नी, सब सुनते है,
सकुशल सुशोबित हूँ,
सभी प्रेम से औतप्रोत हूँ,
बाल बच्चा छोटा है,
दिन भर बाप के लिए रोता है,
घरवाली दिलासा देती है,
फिर मै हौसला भेजता हूँ।
यार सभी ख़ास बनते है,
कुछ उनमे भाई बनते है,
सभी से रिश्ते अच्छे है,
बन्दूक से रिश्ते सच्चे है,
वतन में रहकर कुछ लोग,
करते है बड़बोलिया,
एक रात बिताके देख,
देखेगा खून की होलिया,
इस हाल में रहता है ,
सरहद पर गश्त देने वाला,
हम को क्या लगता है सब,
उठा बैठ देने वाला।
सभी को सोना है,
सभी को रोना है ,
एक बार फिर सरहद पर,
हमे सुलाकर चल दिए
               हमे सुलाकर चल दिए।

Thursday, 22 September 2016

ज़ख़्मी हूँ।

ज़ख़्मी हूँ तबसे जबसे रिश्ते बिगड़े,
फिर लोगों की समझाईश से उनसे रिश्ते बिगड़े,
बड़ा अपना बनता है वो इस ज़माने में मोहसिन,
खुद से रिश्ते बचाने में अब खुदा से रिश्ते बिगड़े।

जुदा हुआ था वो मुझसे किसी ज़माने में,
गुनहगार बता दिया मुझे उसी ज़माने में,
मेरे लफ्ज़ उस तक कुछ पहुचने ना दिए,
ग़लतफ़हमी का करार हुए हम उसी ज़माने में।

Saturday, 17 September 2016

बटवारा

हर्फ़ इंसानियत का उर्दू हिंदी नही होता।
भगवा और हरा कोई धर्म नही होता,

अंदाज़ा था मुझको कोई तो धर्म लाएगा,
मालूम नही था साथ विकट बैर लाएगा।

चाँद पर भी अब तो अधिकार होने लगे है,
खुदको सब राम और कही रहीम कहने लगे है।

ये रंग ये समां अब किस काम का रह गया,
धोती को भगवा,पठानि को हरा करके रह गया।

नाम से अलग करना मर्यादा बन चुकी है,
अली की तो कही हरी की ताबीर बन चुकी है।

पता नही कौन था जिसने दुनिया बनाई,
मंदिर बनाये, मस्जिद बनाई, नवाज़िश नही बनाई।

Thursday, 4 August 2016

“ग़ज़ल"

मुनासिब तो नही जीना चाहिए।
दोजख के लिए पीना चाहिए।
               
जहाँ में मुझको लोग काफी नही जानते,
चार कंधे ही लगते है अब चलना चाहिए।

ये मसला शुरू से बहुत संगीन था,
दिल तो बड़ा है माफ़ ना करना चाहिए।

मुझको तू न मिला यार पर था तू वही,
इश्क़ में धोखा मिला संभलना चाहिए।

शक करती थी वो मुझपे उस्तादी से,
मोहसिन की नज़र से बचना चाहिए।

Tuesday, 2 August 2016

“मंज़िल"।

मेरे अकेलेपन में तू कुछ इस तरह आई,
जेसे शांत समंदर में लहरे उठकर आ गयी हो,
हौसला दिया ताकि आगे मंज़िल तय कर सकु,
वजूद दिया जिससे मंज़िल में हौसला भर सकु।

दिल को आराम मिलता है तुझसे बात करने में,
इश्क़ मोहब्बत से परे है लेकिन ये सब,
कुछ खास तो नही पर एक ख्वाइश ज़रूर है
खुदा से,
खुशिया जब बाटे तो एक आवाज़ ज़रूर दे देना।

बस कुछ और वक़्त फिर हम साथ होंगे,
इश्क़ में फिर दोनों बदनाम होंगे,
ये मौका हमको फिर नही मिलेगा,
और मिला भी तो फिर क़त्ल सरेआम होंगे।